English বাংলা ગુજરાતી ಕನ್ನಡ മലയാളം தமிழ் తెలుగు
Filmibeat Hindi

जननी तेरे रूप अनेक

Posted by:
 

जननी तेरे रूप अनेक

ऋतु राय, लखनऊ से  

तू ही अर्धांगिनी
तू ही पुरुष समाज स्वामित्वनी
तू ही भागिनी
तू ही भामिनी
तू ही जग्दात्री
तू ही कामिनी
तू ही संगिनी
तू ही सर्व समाज प्रधायानी
तू ही अंकित है सजीव मंडल में
तू ही अंकुरित है अनंत दर्पण में
तुने ही अंगीकृत किया इस संसार को
तो कैसा ये अंकुश तेरे ही निर्माण को
तेरे ही अंग तेरा ही अंश
फिर क्यूँ नहीं है तेरा कोई वंश
तेरा आँचल सदा सुख दाई
फिर क्यूँ जमाना दिखाता तुझे खाई
तेरे ही विश्वास से क्यूँ खेलते लोग
क्यूँ हमेशा घायल करते तेरी ममता को वो।

लेखक परिचय- ऋतु राय, लखनऊ विश्‍वविद्यालय की छात्रा हैं और लखनऊ के हुसैनगंज इलाके की निवासी हैं।

नोट-आप भी भेज सकते हैं अपनी कविताएं व लेख। Mail- hindi@oneindia.co.in । कविता के कॉपीराइट के लिए वनइंडिया जिम्‍मेदार नहीं है।

English summary
Here is the poetry on Women's Day written by student of Lucknow University Ritu Rai. Ritu resides in Hussainganj of Lucknow and having keen interest in writing poetry.
कमेंट करें
Subscribe Newsletter
Videos You May Like